दिवाली क्यों मनाते हैं? प्रकाश पर्व के पीछे के कारण

 जय श्री राम दोस्तो

दिवाली, जिसे दीपावली भी कहते हैं, भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। यह सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि पाँच दिनों तक चलने वाला प्रकाश, खुशियों और सद्भाव का पर्व है। इस दौरान घरों को दीयों और रंग-बिरंगी लाइटों से सजाया जाता है, मिठाइयाँ बांटी जाती हैं और परिवार एक साथ मिलकर खुशियाँ मनाते हैं। लेकिन इस जगमग रोशनी और उत्साह के पीछे क्या कारण हैं? आइए जानते हैं इस प्रकाश पर्व को मनाने के कुछ प्रमुख कारण और इसका महत्व।


1. भगवान राम की अयोध्या वापसी

दिवाली मनाने का सबसे प्रमुख और व्यापक रूप से माना जाने वाला कारण भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण का 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटना है। रावण का वध करके राम जब अयोध्या लौटे, तो प्रजा ने उनके आगमन पर घी के दीये जलाकर उनका भव्य स्वागत किया। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक बन गया। इसी खुशी में हर साल दिवाली मनाई जाती है।


2. देवी लक्ष्मी का जन्म और पूजा

दिवाली का पर्व धन और समृद्धि की देवी, माता लक्ष्मी से भी जुड़ा है। माना जाता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के दौरान देवी लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसलिए, दिवाली के दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है ताकि घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य का आगमन हो। व्यापारी वर्ग के लिए यह दिन नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत का भी प्रतीक होता है, जहाँ वे अपने बही-खातों की पूजा करते हैं।



3. भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर का वध

दक्षिण भारत में, दिवाली का पर्व भगवान कृष्ण द्वारा राक्षस नरकासुर के वध से भी जुड़ा हुआ है। नरकासुर ने अपनी क्रूरता से लोगों को आतंकित कर रखा था। भगवान कृष्ण ने उसका वध करके लोगों को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। इस विजय के उपलक्ष्य में, दक्षिण भारत में दिवाली के एक दिन पहले नरक चतुर्दशी मनाई जाती है और उसके अगले दिन मुख्य दिवाली होती है।


4. जैन धर्म में महावीर निर्वाण दिवस

जैन धर्म के अनुयायियों के लिए, दिवाली का दिन बहुत महत्व रखता है क्योंकि यह भगवान महावीर के निर्वाण (मोक्ष) दिवस के रूप में मनाया जाता है। 24वें और अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने इसी दिन पावापुरी में अपना शरीर त्यागा था। जैन मंदिरों में इस दिन विशेष प्रार्थनाएँ और दीपक जलाए जाते हैं।


5. सिख धर्म में बंदी छोड़ दिवस

सिख धर्म में, दिवाली को 'बंदी छोड़ दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन, छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद जी, मुगल सम्राट जहांगीर की कैद से 52 अन्य राजाओं के साथ मुक्त हुए थे और अमृतसर स्थित हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) पहुँचे थे। उनकी वापसी पर स्वर्ण मंदिर को दीयों से सजाया गया था।


इन विभिन्न कारणों के बावजूद, दिवाली का मूल संदेश एक ही है: **अंधकार पर प्रकाश की, बुराई पर अच्छाई की और निराशा पर आशा की विजय।** यह त्योहार हमें एक साथ आने, प्यार बांटने और सकारात्मकता फैलाने का अवसर देता है। यही कारण है कि दिवाली सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता और सद्भाव का प्रतीक है।

बुराई पर सत्य की विजय हो, जय श्री राम, धन्यवाद मेरी पोस्ट पढ़ने के लिए.

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Milan Tomic

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